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Sunday, September 10, 2017

Rashtra bhakti aur bhawna se khelna ,n to desh hit me hai air n janta me hit me.

 आदरणीय बाबा रामदेव जी,
भारत के लाखों लोग पतंजलि और दिव्य योग के उत्पादों का प्रयोग इस लिए ही नहीं करते कि वह गुणवत्ता मैं बहुत अच्छी है बल्कि लोग शुरू शुरू में आपके उत्पादों का प्रयोग राष्ट्रीयता और देशभक्ति के साथ-साथ कम दाम के कारण भी खरीदते थे ।
शुरुआत में आपने स्वयं को प्रचार विरोधी बताकर पतंजलि उत्पाद को अच्छी गुणवत्ता के साथ मार्केट में उतारा जो सही भी था और लोगों ने उसे पसंद भी किया परंतु धीरे-धीरे कब आपके सामानों की कीमत ज्यादा होती चली गई पता न चला ।
और अब इतनी ज्यादा हो चुकी है की चिंता का विषय बन चुका है ।
अब TV पर हर तीसरा प्रचार पतंजलि का है तो क्या इससे यह लगाया जाए कि आप भी अर्थ तंत्र की एक बड़ी मछली के रूप में सामानों को महंगे दामों पर बेचेंगे?
जो चूर्ण 2015 में 40 का था वही 2016 में 85 का कैसे हो गया ?
100% से भी ज्यादा की बढ़ोतरी ..?
मई 2016 में जिस बादाम रोगन का दाम 110 रुपये था ऐसा क्या हुआ कि वह मात्र 9 माह बाद मार्च 2017 में 150 का हो गया यानी 36% कि बढ़ोत्तरी । यह मूल्य वर्धन की पराकाष्ठा या त्रासदी है । मुझे आपसे यह उम्मीद नहीं थी । ऐसे ही 2 माह पहले बेसन का दाम राजधानी बेसन से 15 रुपये सस्ता था और आज 15 रुपये महंगा हो गया है ।
अब मुझे ऐसा लगने लगा है कि आप के उत्पाद की न्यूरोमार्केटिंग से बाहर आकर मुझे सोचना पड़ेगा क्यों कि आप जनता का बेवकूफ काटने लगे हैं । भावना और देशभक्ति बेचने के दिन लद गए......
जनता को भी अब यथार्थ पर आना चाहिए और पतंजलि को भी अपने उत्पाद सही दामों पर बेचने का दबाव बनाना चाहिए ।
और साथ साथ यह भी बताइये की आप पहले कैमिकल का विरोध करते थे तो आपके शैम्पू और आपके साबुनों में क्या लक्ष्मन को जीवित करनेवाला जड़ीबूटी डाला है क्या......
हमे ये बताइये आपके ब्यूटी-प्रोडक्ट्स, फेसवाश, सर्फ़, स्लिम-पाउडर ये सब क्या आपने बिना कैमिकल के ही बना लिया
और आपको नूडल्स बनाने की क्या पर गयी......ये तो चीन का भोजन है और उसका कॉपी करके आपका किस देशभक्ति का काम कर रहे है.....आपके बिस्कुट आपके चोकोफ्लेक्स क्या ये सब विदेशी सामानों का नक़ल नही है.......अगर आप देशभक्ति का काम करते तो हर सामान आप और कंपनियों की भांति या उससे भी महंगे दामो में नही बेचते लेकिन नही. आपने तो धंधा शुरू कर दिया........योग सिखाते सिखाते आप कब बिजनेसमैन बन गए पता ही नही चला
धीरे धीरे आपके देशभक्ति वाले उत्पाद आम आदमी के पहुच से बाहर हो रहे है..
दोस्तों इसे ज़रूर शेयर करे क्यों की आजकल की पब्लिक सब समझती है बस ज़रूरत है उन्हें थोड़ा बताने की और जागरूक करने की इसलिए इस तरफ ज़रूर ध्यान दें क्योंकि देश में एकाधिकार का जनम हो रहा है जो लोकतंत्र के लिए घातक साबित हो सकता है इसलिए हर गलत दिशा में उठते हुए कदम का विरोध करना है।

स्वदेशी के नाम डकैती अब बन्द होना चाहिए ।

वन्देमातरम

Tuesday, August 29, 2017

ढोकलाम में चीन का पीछे हटना,भारत की जनता का दबाव है,जिसने चीनी सामान का बाई काट किया।

 ढोकलाम में चीन का पीछे हटना,भारत की जनता का दबाव है,जिसने चीनी सामान का बाई काट किया। और सन 1962 की रेखा के पार पहुंचाना चाहते हो तो टोटल बायकॉट करो।

Sunday, August 20, 2017

बिहार की राजनीती

 बिहार की राजनीती बाढ़ से नहीं बल्कि बहार से चलती है और बहार युवाओं के फुहार से !क्या युवा राजनीती के नये रंग से देश को सराबोर करेंगे?"जितना खुला खुला सा दिल है,उतनी बंदिश बढ़ी मुश्किल है।"

Tuesday, August 15, 2017

71वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर vआप सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। 800 करोड़ की बेनामी सम्पति जप्त,लाल किले से 70 साल बाद आई आवाज।पर इस सम्पति के मालिको का नाम जनता को सार्वजनिक किया जायेगा! 

Monday, July 31, 2017

हे दिल्ली तुझको समालकम

कंधे का बोतल पटक दिया।सिर पर से बोतल उतर गया।।ढंनमन सब बोतल जमींदोज़ हुए। अब आर.ओ.का बोतल कहाँ गया? पहचानो फिर से हे दिल्ली!

Wednesday, July 12, 2017

नवगीत के प्रवर्तक ,कवि एवं साहित्यकार राजेंद्र प्रसाद सिंह अपने आप में एक साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था थे। उन्होंने मुजफ्फरपुर में अपनी प्रतिभा, मेहनत और लगन द्वारा एक ऐसा सकारात्मक माहौल तैयार किया, जिसके कारण बहुत सारे कवियों और साहित्यकारों का जन्म हुआ । मेरे गुरु , जनवादी कवि, नाटककार,रंगकर्मी, उपन्यासकार , एवं अखिल भारतीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा ( विकल्प) के संस्थापक राष्ट्रीय अध्यक्ष काॅमरेड यादवचंद्र के वे बहुत अच्छे मित्र थे। वे मुझे भी बहुत स्नेह देते थे । मुजफ्फरपुर शहर के किसी भी कोने में मैं साहित्यिक आयोजन करता ,उनको जरूर आमंत्रित करता । वे समय पर पहुँच जाते । अत्यल्प उपस्थिति के कारण जब मेरा मन खिन्न हो जाता , वे हिम्मत देते और अकेले ही घंटों कविता सुनाकर एक समां बांध देते। मेरी पहली मुलाकात सन् 1995 में दिनकर जयन्ती पर सिकंदरपुर में हुई । उसके बाद आजीवन उनसे मुलाकातों का सिलसिला जारी रहा। मैं बराबर उनके घर ( आधुनिका) पर चला जाता और घंटों उनसे साहित्यिक चर्चा करता । कभी-कभी शहर के प्रतिष्ठित पत्रकार कन्हैयाशरण जी के साहू रोड स्थित घर पर जाता और वहीं राजेंद्र प्रसाद सिंह जी से भी भेंट हो जाती । 'भूमिका', 'डायरी के जन्मदिन', 'उजली कसौटी', 'शब्द यात्रा', 'प्रस्थान बिन्दु', 'अमावस और जुगनू', 'लाल नील धारा', 'गज़र आधी रात का', 'आओ खुली बयार', 'भड़ी सड़क पर ' आदि उनकी महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं । उन्होंने पुरा जीवन साहित्य और समाज को समर्पित कर दिया । यह बड़ी बात है । ( 12 जुलाई को राजेंद्र प्रसाद सिंह की जयन्ती है । उन्हे सादर स्मरण एवं श्रद्धा-सुमन ) प्रस्तुत है उनकी एक रचना-- तांबे का आसमान , टीन के सितारे , गैसीला अंधकार , उड़ते है कसफुट के पंछी बेचारे , लोहे की धरती पर चाँदी की धारा पीतल का सूरज है राँगे का भोला-सा चाँद बड़ा प्यारा, सोने के सपनो की नौका है, गंधक का झोंका है, आदमी धुँए के हैं , छाया ने रोका है, हीरे की चाहत ने कभी-कभी टोका है, शीशे ने समझा कि रेडियम का मौका है , धूल 'अनकल्जर्ड' है, इसलिए बिकती है- -'ज़िन्दगी नहीं है यह-धोखा है, धोखा है!'

yनवगीत के प्रवर्तक ,कवि एवं साहित्यकार राजेंद्र प्रसाद सिंह अपने आप में एक साहित्यिक-सांस्कृतिक  संस्था थे।  उन्होंने मुजफ्फरपुर में अपनी प्रतिभा, मेहनत और लगन द्वारा एक ऐसा सकारात्मक माहौल तैयार किया, जिसके कारण बहुत सारे कवियों  और साहित्यकारों का जन्म हुआ । मेरे गुरु , जनवादी कवि, नाटककार,रंगकर्मी,  उपन्यासकार , एवं अखिल भारतीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा ( विकल्प) के संस्थापक राष्ट्रीय अध्यक्ष  काॅमरेड यादवचंद्र के वे बहुत अच्छे मित्र थे।
       वे मुझे भी बहुत स्नेह देते थे । मुजफ्फरपुर शहर के किसी भी कोने में मैं साहित्यिक आयोजन करता ,उनको जरूर आमंत्रित करता । वे समय पर पहुँच जाते । अत्यल्प उपस्थिति के कारण जब मेरा मन खिन्न हो जाता , वे हिम्मत देते और अकेले ही घंटों कविता सुनाकर एक समां बांध देते। मेरी पहली मुलाकात सन् 1995 में दिनकर जयन्ती पर सिकंदरपुर में हुई । उसके बाद आजीवन उनसे मुलाकातों का सिलसिला जारी रहा। मैं बराबर उनके घर ( आधुनिका) पर चला जाता और घंटों उनसे साहित्यिक चर्चा करता । कभी-कभी शहर के प्रतिष्ठित पत्रकार कन्हैयाशरण जी के साहू रोड स्थित घर पर जाता और वहीं राजेंद्र प्रसाद सिंह जी से भी भेंट हो जाती ।
            'भूमिका', 'डायरी के जन्मदिन', 'उजली कसौटी', 
'शब्द यात्रा', 'प्रस्थान बिन्दु', 'अमावस और जुगनू', 'लाल नील धारा', 'गज़र आधी रात का', 'आओ खुली बयार', 'भड़ी सड़क पर ' आदि उनकी महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं । उन्होंने पुरा जीवन साहित्य और समाज को समर्पित कर दिया । यह बड़ी बात है ।
( 12 जुलाई को राजेंद्र प्रसाद सिंह की जयन्ती है । उन्हे सादर स्मरण एवं श्रद्धा-सुमन )
   प्रस्तुत है उनकी एक रचना--
                     तांबे का आसमान ,
                      टीन के सितारे ,
                      गैसीला अंधकार ,
                       उड़ते है कसफुट के पंछी बेचारे ,
                       लोहे की धरती पर 
                       चाँदी की धारा 
                       पीतल का सूरज है
                       राँगे का भोला-सा चाँद बड़ा प्यारा,
                       सोने के सपनो की नौका है, 
                       गंधक का झोंका है, 
                       आदमी धुँए के हैं , 
                      छाया ने रोका है, 
                       हीरे की चाहत ने 
                      कभी-कभी टोका है, 
                      शीशे ने समझा 
                      कि रेडियम का मौका है ,
                       धूल 'अनकल्जर्ड' है,
                      इसलिए बिकती है-
              -'ज़िन्दगी नहीं है यह-धोखा है, धोखा है!'

Kawivar_Rajendra Prasad Singh DOB 12 july copy

jpeg Rajendra Prasad Singh DOB 12 july copy ,Who inaugurate the meeting  on " SAMALAK as a word & style in literature and art. Read details in "ABOUT" column on 'samalak.blogspot.com '