गजल
(97)
(रचना काल-16 मई 1998) 97 गजल 3
जिंदगी को नजरिये से बांधो नहीं श्याम तुम हो, सांवरिये से बांधो नहीं
कृष्ण गोपाल गोकुल के माधव हो तुम, वृन्दावन की गुजरियों से बांधो नहीं
होगी राधा भी आधा सुबह शाम में , दिन को तुम दोपहरिये से बांधो नहीं
रात कल स्याह थी आज है चाँदनी , कल को बढ़ते उमिरियों से बांधो नहीं
ज्वार उठता है तो भाटा होगा वहाँ , तल को समतल लहरियों से बांधो नहीं
गोरे गाल उमड़ा है कातिल यह तील, दिल को साहिल रसरियों से बांधो नहीं
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